खर्चा खर्चा खर्चा,
चलो जेब पे कर ले चर्चा,
जब आता है पैसा,
सीना मेरा तनता,
खर्च करने को पैसा,
जी मेरा मचलता,
जब जाता है पैसा,
दिल सिकुड़ सा जाता,
हाफ पाफ करता,
पर्स भी झल्लाता,
फिर चीख चीख के कहता,
भईया कम करो अब खर्चा,
कम करो अब खर्चा।
--सुमन्त शेखर
मेरे ख्यालों के कुछ रंग मेरे भावो की अभिव्यक्ति है। जीवन में घटित होने वाली घटनायें कभी कभी प्रेरणा स्रोत का काम कर जाती है । यही प्रेरणा शब्दों के माध्यम से प्रस्फुटित होती है जिसे मैंने कविता के रूप सजाने का प्रयास किया है । आनंद लिजिये।
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सोमवार, 26 सितंबर 2016
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