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बुधवार, 25 सितंबर 2019

बरसात

इन्द्रधनुष हुआ आच्छादित,
मेघों ने उसका संधान किया,
तड़ित वाणों से आपस मे मिलकर,
जोरो से गर्जन नाद किया,
आघातों को सह कर के फिर,
मेघों ने है बरसात किया।

काले काले बादल थे वो,
अहंकार में था नाद किया,
आपस मे लड़कर फिर मेघों में,
जल बूंदों में विस्तार किया,
नन्ही नन्ही बूंदों ने फिर,
वर्षा कर धरा का मार्ग लिया।
--सुमन्त शेखर

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

बरसात

गर्मी में पानी,
जब लाई है आंधी,
तब्दील हो गयी
नदी में नाली।

लगे समंदर
सा हर मंजर,
गली गली,
या शहर शहर।

मौसम ने बदला,
आज जो करवट,
गाड़ी में बैठ के,
बन जा केवट।

--सुमन्त शेखर।

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

सैलाब

इस मौसम में देखो बारिश में क्या कहर ढाया है,
मेरे शहर में अब हर जगह सैलाब आया है,

शजर था उस जमीं पे कभी ये खयाल आया है,
हर मंजर अब उजड़ा उजड़ा सा नजर आया है,

पक्की जमीनों का हौसला भी अब टूटने लगा है,
शायद सड़क थी यहां भी मुझको खयाल आया है,

भरने लगे है नदी नाले सब,
कोई फरियाद रंग लाया है,
बरसते है बादल रात दिन अब हर बखत,
मौसम में शायद कोई बदलाव आया है,

की बस कर कितना और बरसेगा तु बादल,
मेरे शहर में तू समंदर ले आया है।
--सुमन्त शेखर।

सोमवार, 22 मई 2017

तड़ित

प्रचंड प्रबल वेग से,
पवन गतिमान है,
मेघाभिमान नभ में,
तड़ित प्रकाशमान है,
जलकणों में टूट से,
शीत का संचार है,
नवबिन्दु के प्रभाव से,
अंकुर में भी जान है।

लो हुई मेघों में मार है,
तड़ित की झंकार है,
जलबिंदु की बौछार है,
नभ का धरा पर वार है,
रात्रि का उसे साथ है,
सर्वत्र अंधकार है।
--सुमन्त शेखर।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

ऐ बरसते बादलो

ऐ बरसते बादलो,
यू ना बरसो सब जगह,
बरसना ही है तो बरसो वहाँ,
इक बूंद को तरसते लोग जहा,

माना कि तूने भर दिए है,
हर गड्ढ़े हर नाली,
पर नहीं मिला है जीवों को,
पिने का साफ पानी,

मत बरस तू इतना ज्यादा,
मेरे शहर में,
नहीं यहाँ मिट्टी की जमीन,
अब कंक्रीट खाली,

ना जायेगा पानी जमीन के भीतर,
बह जायेगा संग नाली,
सड़को पर भरेगा पानी,
सबको होगी बहुत परेशानी,

ऐ बरसते बादलो,
यू ना बरसो सब जगह,
बरसना ही है तो बरसो वहाँ,
इक बूंद को तरसते लोग जहा।

--सुमन्त शेखर।

रविवार, 8 मई 2016

बरसने दे।

मिल रही है राहत आज,
सूरज की तपिश से,
जब गिर रहें है ओले,
आसमा से जमीं पे।
सुन रहा हूँ घोर गर्जना,
नभ् के आज सिने से,
चमक रही है बिजलियाँ,
कि आज इन्हें बरसने दे।
-सुमन्त शेखर

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

बारिश के बादल

बादल छाये थे बड़े घनेरे,
अब बारिश होने को थी,
मन का मयुर उतावला हो चला था,
शायद आज तन गिला होना था,
तभी बादलों का गड़ गड़ाना हुआ,
पानी की छोटी छोटी बुँदे,
आसमान से धरती की तरफ,
तीव्र वेग से आती हुई,
जब धरा से टकराई,
एक पफ की आवाज आई,
मिट्टी की एक सोंधी सी खुशबु,
मेरे मन को भाई,
फिर एकाएक ठंडी हवाए आई,
डर लगा जैसे ये बारिश न भगाए,
कुछ बूँद ही सही,
मेरे घर के छत पे आये,
फिर कुछ थमी हवाए,
गीली हुई थी अब ये फ़िज़ाएं,
ठंडक का एहसास मिला है,
बाहर सब साफ सुथरा है,
अब बस ऐसे ही बारिश हो,
जरुरत भर जितनी हो,
कुछ फूल कलियाँ अब खिल जाएँगी,
मुरझाये पोधे जागेंगे,
बस बादल तू ऐसे ही आना,
हर गली खेत को सदा भिगाना,
रहे न सुखा जग में कही,
बादल तू अच्छे से आना।
--सुमन्त शेखर।

मंगलवार, 15 मार्च 2016

बारिश

कबसे जमी थी धुल,
आज धुल गयी,
मेरे शहर में भी आज,
बारिश हो गयी।
काले होते हुए पत्तो में भी,
आज हरियाली छा गयी,
गर्मी के सितम से थे सब परेशा,
लो अब ठंडी हो गयी,
पसीना से जो गिला हुआ था,
आज राहत मिल गयी,
कब की प्यासी थी जमी,
आज इसकी प्यास बुझ गयी।
-- सुमन्त शेखर।

गुरुवार, 6 मार्च 2014

अम्बर बारिश करवाता है

ग्रीष्म में तपी धरती 
जब उगलती आग 
झड़ जाते है पत्ते सारे 
सुनी रहती डाल 

स्वेद से तन गीला होता 
और शुष्क होते प्राण 
सब अम्बर से है आस लगाते 
अब जल्दी से बरसात करा दे 

लो अब अम्बर गहराता है 
घनघोर घटाये लाता है 
नभ से फिर बरसाता है 
जीवन की प्यास बुझाता है 

नव जीवन तब इठलाती है 
धरती दुल्हन सी सज जाती है 
खग मोर पपीहा गाते है 
जीवन का राग सुनाते है 

बारिश की छोटी बूंदो से 
जब धरा का संगम होता है 
नव जीवन का अंकुर जगत में 
अंगड़ाई ले जग जाता है 

गर्मी की अलसाई रातो में
अब नया सबेरा होता है 
नव जीवन के रंगो से अब
अम्बर बारिश करवाता है 
--सुमन्त शेखर