लल्लू भईया घर से निकले,
सुबह में आफिस जाने को,
बीच सड़क में जाम लगा था,
अब नही राह कोई जाने को,
बीत गया जब जाम में घंटा,
आफिस लगा बुलाने को,
पगडंडी पर भागे भईया,
आफिस जल्दी जाने को,
वहाँ भी लंबी लाइन खड़ी थी,
लल्लू भईया पछताए रे,
बड़ी मुश्किल से लल्लू भईया,
फिर सड़क में वापस आये रे,
इस आने जाने के क्रम में,
लल्लू भईया चकराए रे,
थक हार के लल्लू भईया,
वापस घर को आये रे।
--सुमन्त शेखर।
मेरे ख्यालों के कुछ रंग मेरे भावो की अभिव्यक्ति है। जीवन में घटित होने वाली घटनायें कभी कभी प्रेरणा स्रोत का काम कर जाती है । यही प्रेरणा शब्दों के माध्यम से प्रस्फुटित होती है जिसे मैंने कविता के रूप सजाने का प्रयास किया है । आनंद लिजिये।
सोमवार, 25 सितंबर 2017
ट्रैफिक जाम
गुरुवार, 21 सितंबर 2017
स्वप्न
जब से ये खबर चर्चा ए आम हुई है,
सबके स्वप्न साकार करते है हम,
लल्लू भईया ना जाने क्यों,
नए नए स्वप्न देखने लगे है,
अभी पिछले हफ्ते की बात है,
लाटरी का था स्वप्न जो देखा,
मालामाल हो गए लल्लू भईया,
अपनी भी थी चांदी चांदी,
फिर जाने कैसा दुःस्वप्न था देखा,
बड़े दुखी थे लल्लू भईया,
मिलना जुलना भूल गए वो,
महीना भर हमसे दूर रहे वो,
बाद में हमको मालूम हुआ ये,
महिलाओं के हाथों पिट गए वो,
स्वप्न में ये सब देख लिए थे,
तभी लल्लू भईया दूर हुए थे।
--सुमन्त शेखर।
शनिवार, 2 सितंबर 2017
फ़ोन
पर्दे के पीछे की तस्वीर थी कुछ ऐसी,
कुर्सी पे बैठी हो कोई शख्शियत जैसी,
सर झुके थे बंदगी में उसके
हाथ उठे थे सजदे में जैसे,
तभी हवा का झोंका से आया,
परदे को उसने जरा सरकाया,
सत्य नजर के सामने था आया,
फ़ोन पर बंदा बिजी था भाया।
-- सुमन्त शेखर।
बुधवार, 23 अगस्त 2017
परिवहन
हम पार हर रोज करत,
कभी कभी पानीपत,
कही कही कीचड़ पथ,
कभी कही ट्रक उलट,
कही खड्ड में सड़क दिखत,
सब धीरे चलत,
है जाम बनत।
--सुमन्त शेखर।
बुधवार, 26 जुलाई 2017
सत्ता परिवर्तन
रथ को रोकने के ख्वाब थे उनके,
जो दामन ना बचा पाए है अपने,
समझाया था इशारो में आपको,
यही मौका है बच के निकल लो,
समझ की कमी थी शायद उनमे,
तभी तो मंत्री जी साथ छोड़ गए,
भाईचारा में ना भाई रहा ना चारा,
मान भी लो नीतीश ना रहा तुम्हारा,
समीकरण भी कैसे है रंग बदलता,
सत्ता बदल गयी पर मंत्री ना बदला।
--सुमन्त शेखर।
रविवार, 16 जुलाई 2017
शिकायत
लोगो को शिकायत है हमसे,
की हम बात नही करते उनसे,
एक बार आवाज दे के तो देखो,
कैसे बात नही करते हम तुमसे।
हां मशरूफ हूँ मैं काम मे अपने,
बस गुफ्तगू का वक्त नही मिलता,
जिंदगी की इस भागदौड़ में,
मैं कई बार खुद से नही मिलता।
पर ये भी तो सच है,
जब आवाज दिया किसी ने,
दो मिनट समय निकाल के,
उसी वक्त बात किया हम ने।
--सुमन्त शेखर।
मंगलवार, 20 जून 2017
याद है
बीएमटीसी की बस में,
वो धक्के खाना याद है,
भीड़ भाड़ में बस में अक्सर,
छक के चढ़ना याद है,
सीट मिलने की आस में,
वो डट के रहना याद है,
चाहे बैग से या पैर से,
सीट के पासअड़े रहना याद है,
रोज रोज के सफर में अक्सर,
सबसे मिलना जुलना याद है,
मिले सीट तो फिर,
अच्छे से तन के सोना याद है,
कूदे बस जो गड्ढे में फिर
नींद से जगना याद है,
अपने स्टाप का अक्सर,
नींद में छूटना याद है,
फिर दूसरी बस से अक्सर,
वापस आना याद है,
पास रहने से पास में अपने,
बस में चढ़ना उतरना याद है,
बीएमटीसी की बस में,
वो धक्के खाना याद है।
बीएमटीसी की बस में,
वो धक्के खाना याद है,
--सुमन्त शेखर।