यूपी के चाल देख ए बबुआ,
मोदी के पीछे चलल हे योगिया,
आज जे है प्रदेश में मुखिया,
कल हो जाई पुरे देश के मुखिया।
--सुमन्त शेखर।
मेरे ख्यालों के कुछ रंग मेरे भावो की अभिव्यक्ति है। जीवन में घटित होने वाली घटनायें कभी कभी प्रेरणा स्रोत का काम कर जाती है । यही प्रेरणा शब्दों के माध्यम से प्रस्फुटित होती है जिसे मैंने कविता के रूप सजाने का प्रयास किया है । आनंद लिजिये।
सोमवार, 20 मार्च 2017
मुखिया
रविवार, 12 मार्च 2017
होलिका दहन
होलिका दहन हो रहा है
जला दो आज,
अपने भीतर बसे,
अहंकार, तृष्णा,
ईर्ष्या, द्वेष,
तमस को,
कल फिर मिलेंगे,
भाईचारे के सन्देश के साथ,
प्रेम, सौहाद्र की चेतना लिए,
होली की शुभकामनाओं के साथ,
आप सबो को होली की मुबारकबाद।
-- सुमन्त शेखर 🙏
सोमवार, 20 फ़रवरी 2017
वाकया
गेट तो हमने भी उड़ाया था,
दीवार के बारे में सोचा भी नहीं,
वो वाकया भी बड़ा गजब था,
जो रास्ते में हमे दिखाई दिया।
वो तो एक ट्रक निकला,
जो हमसे आगे बढ़ गया,
गेट और दीवार को छोड़,
घर के भीतर घुस गया।
मेहरबाँ था आज ऊपरवाला,
नुकसान केवल आर्थिक निकला,
सड़क किनारे घर होने का,
ये भी एक नुकसान निकला।
घर था वो बड़ा मजबूत वाला,
करोड़ पति के रुतबे वाला,
ढह गया दीवार आज उसका,
ये दीवार नहीं, रुतबा था उसका।
--सुमन्त शेखर।
सोमवार, 13 फ़रवरी 2017
चकोर
हमने चाँद पे नजरें लगा रखी थी,
की कहीं चाँद नजरों से ओझल ना होजाये,
कम्बख्त बादल आ गए कहीं से,
और हम चकोर ना हो पाए।
--सुमन्त शेखर।
गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017
गुलाब
गुल से खिलता है गुलाब,
धतूरे को कौन पूछता है,
अरे मोहब्बत का है ये बाजार,
हमे देखता कौन है।
परवानो से है पटा पड़ा,
ये सारा बाजार,
ढूंढ सको तो ढूंढ लो,
तुम अपना सच्चा प्यार,
हर रांझे को हीर मिले,
हर मजनू को लैला,
घर जाने का समय हो गया,
मैं चला बांध के थैला।
--सुमन्त शेखर।
शनिवार, 12 नवंबर 2016
नोटबंदी
ना देखी थी लाइन कभी इतनी लंबी,
किसी लंगर में यारों,
दिख रही है जितनी लंबी आज,
सभी बैंकों के बहार,
शामियाने लगे है ऐसे ,
बैंको के बहार,
लगता है जैसे ,
कोई बैंक पर्व हो आज,
खुल्ला नहीं है,
आज मेरे पास,
देवी लक्ष्मी नाराज है,
बहुतो से आज,
ना एटीएम से मिला पैसा,
ना बैंक में मैं जा सका,
डेबिट कार्ड है संग मेरे,
जिससे मैं राशन ला सका।
--सुमन्त शेखर।
सोमवार, 26 सितंबर 2016
खर्चा
खर्चा खर्चा खर्चा,
चलो जेब पे कर ले चर्चा,
जब आता है पैसा,
सीना मेरा तनता,
खर्च करने को पैसा,
जी मेरा मचलता,
जब जाता है पैसा,
दिल सिकुड़ सा जाता,
हाफ पाफ करता,
पर्स भी झल्लाता,
फिर चीख चीख के कहता,
भईया कम करो अब खर्चा,
कम करो अब खर्चा।
--सुमन्त शेखर