हम पार हर रोज करत,
कभी कभी पानीपत,
कही कही कीचड़ पथ,
कभी कही ट्रक उलट,
कही खड्ड में सड़क दिखत,
सब धीरे चलत,
है जाम बनत।
--सुमन्त शेखर।
मेरे ख्यालों के कुछ रंग मेरे भावो की अभिव्यक्ति है। जीवन में घटित होने वाली घटनायें कभी कभी प्रेरणा स्रोत का काम कर जाती है । यही प्रेरणा शब्दों के माध्यम से प्रस्फुटित होती है जिसे मैंने कविता के रूप सजाने का प्रयास किया है । आनंद लिजिये।
रथ को रोकने के ख्वाब थे उनके,
जो दामन ना बचा पाए है अपने,
समझाया था इशारो में आपको,
यही मौका है बच के निकल लो,
समझ की कमी थी शायद उनमे,
तभी तो मंत्री जी साथ छोड़ गए,
भाईचारा में ना भाई रहा ना चारा,
मान भी लो नीतीश ना रहा तुम्हारा,
समीकरण भी कैसे है रंग बदलता,
सत्ता बदल गयी पर मंत्री ना बदला।
--सुमन्त शेखर।
लोगो को शिकायत है हमसे,
की हम बात नही करते उनसे,
एक बार आवाज दे के तो देखो,
कैसे बात नही करते हम तुमसे।
हां मशरूफ हूँ मैं काम मे अपने,
बस गुफ्तगू का वक्त नही मिलता,
जिंदगी की इस भागदौड़ में,
मैं कई बार खुद से नही मिलता।
पर ये भी तो सच है,
जब आवाज दिया किसी ने,
दो मिनट समय निकाल के,
उसी वक्त बात किया हम ने।
--सुमन्त शेखर।
बीएमटीसी की बस में,
वो धक्के खाना याद है,
भीड़ भाड़ में बस में अक्सर,
छक के चढ़ना याद है,
सीट मिलने की आस में,
वो डट के रहना याद है,
चाहे बैग से या पैर से,
सीट के पासअड़े रहना याद है,
रोज रोज के सफर में अक्सर,
सबसे मिलना जुलना याद है,
मिले सीट तो फिर,
अच्छे से तन के सोना याद है,
कूदे बस जो गड्ढे में फिर
नींद से जगना याद है,
अपने स्टाप का अक्सर,
नींद में छूटना याद है,
फिर दूसरी बस से अक्सर,
वापस आना याद है,
पास रहने से पास में अपने,
बस में चढ़ना उतरना याद है,
बीएमटीसी की बस में,
वो धक्के खाना याद है।
बीएमटीसी की बस में,
वो धक्के खाना याद है,
--सुमन्त शेखर।
रातभर मैं करवटें बदलता रहा,
रातभर मैं किश्तों में सोता रहा,
नींद तो आंखों को आती थी,
पर रह रह कर कही चली जाती,
रात भर मौसम को कोसते रहे,
रह रह कर पानी भी पीते रहे,
और ये कमबख्त नींद भी मुझे,
ना जाने कौन कौन से ख्वाब दिखाती रही,
कभी सपने में मुझे हँसाती, कभी रुलाती,
बार बार मुझे भगाती रहती,
मैं फिर उठता, पानी पीता और,
अगले सपने में भागने को तैयार रहता।
--सुमन्त शेखर
प्रचंड प्रबल वेग से,
पवन गतिमान है,
मेघाभिमान नभ में,
तड़ित प्रकाशमान है,
जलकणों में टूट से,
शीत का संचार है,
नवबिन्दु के प्रभाव से,
अंकुर में भी जान है।
लो हुई मेघों में मार है,
तड़ित की झंकार है,
जलबिंदु की बौछार है,
नभ का धरा पर वार है,
रात्रि का उसे साथ है,
सर्वत्र अंधकार है।
--सुमन्त शेखर।
ना दशहरी है भाया,
ना मालदा है आया,
अल्फांसो, मल्लिका,
बैगनपल्ली, सिंधुरा,
बादामी भी लगा फीका
जब केन्ट को मैंने चखा।
कोई आम हो ऐसा,
जो तुम्हे लगा हो अच्छा,
जल्दी से बता दो रे भईया,
मुझे भी है चखना।
©सुमन्त शेखर।