मिल रही है राहत आज,
सूरज की तपिश से,
जब गिर रहें है ओले,
आसमा से जमीं पे।
सुन रहा हूँ घोर गर्जना,
नभ् के आज सिने से,
चमक रही है बिजलियाँ,
कि आज इन्हें बरसने दे।
-सुमन्त शेखर
मेरे ख्यालों के कुछ रंग मेरे भावो की अभिव्यक्ति है। जीवन में घटित होने वाली घटनायें कभी कभी प्रेरणा स्रोत का काम कर जाती है । यही प्रेरणा शब्दों के माध्यम से प्रस्फुटित होती है जिसे मैंने कविता के रूप सजाने का प्रयास किया है । आनंद लिजिये।
रविवार, 8 मई 2016
बरसने दे।
सोमवार, 25 अप्रैल 2016
बारिश के बादल
बादल छाये थे बड़े घनेरे,
अब बारिश होने को थी,
मन का मयुर उतावला हो चला था,
शायद आज तन गिला होना था,
तभी बादलों का गड़ गड़ाना हुआ,
पानी की छोटी छोटी बुँदे,
आसमान से धरती की तरफ,
तीव्र वेग से आती हुई,
जब धरा से टकराई,
एक पफ की आवाज आई,
मिट्टी की एक सोंधी सी खुशबु,
मेरे मन को भाई,
फिर एकाएक ठंडी हवाए आई,
डर लगा जैसे ये बारिश न भगाए,
कुछ बूँद ही सही,
मेरे घर के छत पे आये,
फिर कुछ थमी हवाए,
गीली हुई थी अब ये फ़िज़ाएं,
ठंडक का एहसास मिला है,
बाहर सब साफ सुथरा है,
अब बस ऐसे ही बारिश हो,
जरुरत भर जितनी हो,
कुछ फूल कलियाँ अब खिल जाएँगी,
मुरझाये पोधे जागेंगे,
बस बादल तू ऐसे ही आना,
हर गली खेत को सदा भिगाना,
रहे न सुखा जग में कही,
बादल तू अच्छे से आना।
--सुमन्त शेखर।
गुरुवार, 24 मार्च 2016
।।सफ़र रेल का।।
ग्रीष्म ऋतू में सफ़र रेल का,
तड़ तड़ तड़ तड़ स्वेद तन का,
गर्म हो गया नीर रेल का,
सभी तलाशें पेय शीतल सा।
जब भी कोई स्टेशन आता,
भीड़ पेय की दुकान पे सजता,
पतलून में सब घूम रहे है,
गर्मी से सब त्रस्त है भईया।
कोई मट्ठा देखो पी रहा है,
कोई कोल्ड ड्रिंक पी के झूम रहा है,
कोई ठंडा पानी ढूंढ रहा है,
कोई गर्म मौसम को कोस रहा है।
अब शाम हुई,
गर्मी थोड़ी शांत हुई,
ठंडी अब हो गयी हवाएं,
सब लोगो ने राहत पायी।
--सुमन्त शेखर।
मंगलवार, 15 मार्च 2016
बारिश
कबसे जमी थी धुल,
आज धुल गयी,
मेरे शहर में भी आज,
बारिश हो गयी।
काले होते हुए पत्तो में भी,
आज हरियाली छा गयी,
गर्मी के सितम से थे सब परेशा,
लो अब ठंडी हो गयी,
पसीना से जो गिला हुआ था,
आज राहत मिल गयी,
कब की प्यासी थी जमी,
आज इसकी प्यास बुझ गयी।
-- सुमन्त शेखर।
सोमवार, 22 फ़रवरी 2016
कुरुक्षेत्र
सँघर्ष देखो कुरुक्षेत्र का।
भाई नहीं है लड़ रहे
लड़ रही है जनता।
कोई शकुनि बना यहाँ तो,
कोई दुर्योधन बन लूट रहा,
मूक हुए है भीष्म पितामह,
अपने कर्त्तव्य की जंजीरो से।
कहा छुपे हो कलजुग के कृष्णा,
सकल संसार है ढूंढ रहा,
सब मनुजो को राह दिखा,
सत्य के दर्शन करवा।
गिने चुने दो चार नमुने,
अब बसते हर राज्य में,
दिग्भ्रमित करने के खातिर,
वो चलते रहते चाल अनेक।
भारत माँ के वीर सपूतों,
क्यों फंसते हो तुम भ्रमजाल में,
बुद्धि विवेक से परचम लहराओ,
तुम भारत की शान हो।
बुधवार, 20 जनवरी 2016
केजरी और मोदी की लड़ाई
गुरुवार, 31 दिसंबर 2015
नव वर्ष की बधाई
इक वर्ष के समापन का
धन्यवाद इसके हर देन का
करो अभिनन्दन नववर्ष का
फैले प्रकाश हर्षोल्लास का
मंगलमय पावन हो वर्ष
बीते सबका जीवन सहर्ष
चित्त रहे सदा प्रसन्न
प्रभु करें दया अन्नन्त।
--सुमन्त शेखर