दर्द कितना भी हो,
सीने में छुपाए रखना,
जब सामने दुनिया हो,
मुस्कान बनाए रखना,
दर्द हीरा है, दर्द मोती है,
आंखों से इन्हें मत छलकने देना,
तमाशबीन है लोग यहाँ,
खुद का तमाशा ना बनने देना,
मौकापरस्ती के इस दौर में,
खुद को यू सम्हाले रहना,
जैसे अंगारों पर चल के भी,
पैरो को हो बचाये रखना,
खुद की शख्शियत तुम्हारी,
इसे भीड़ में बचाये रखना,
दर्द कितना भी हो,
सीने में छुपाए रखना।
--सुमन्त
मेरे ख्यालों के कुछ रंग मेरे भावो की अभिव्यक्ति है। जीवन में घटित होने वाली घटनायें कभी कभी प्रेरणा स्रोत का काम कर जाती है । यही प्रेरणा शब्दों के माध्यम से प्रस्फुटित होती है जिसे मैंने कविता के रूप सजाने का प्रयास किया है । आनंद लिजिये।
शनिवार, 27 अक्टूबर 2018
दर्द
रविवार, 23 सितंबर 2018
निर्झर
वो गिराता है खुद को रोज उस ऊँचाई से,
बिखेरने को खुद को टुकड़ो में हजार,
अमृत बिंदु सा श्वेत लगता है दुग्ध धार,
दिखता है निर्झर इन वादियों में कई बार।
यूँ तो टूट कर बिखरने की कला है ये खास,
ऊंचाई से गिर कर भी सम्मान होता न हास,
जब इंद्रधनुष के ताज से सजता दिखता बेहद खास,
सिखाने को अभी बहुत कुछ ऐ निर्झर तेरे पास।
--सुमन्त शेखर
शुक्रवार, 17 अगस्त 2018
।।अजातशत्रु।।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि🙏
पगडंडी से सड़क बनाया,
विदेशो में भी नाम कमाया,
दूध के बदले खीर खिलाया,
घुसपैठियों को चीर भगाया,
पक्ष विपक्ष को साथ बिठाया,
अजातशत्रु का नाम कहलाया,
कुशल वक्ता कवि राजनीतिक छवि,
भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी|
--सुमन्त शेखर
मंगलवार, 14 अगस्त 2018
मोहब्बत
शायरों के बाजार में,
हमारा भी नाम हुआ।
जब से मोहबब्त लिख्खा,
ये शायर बदनाम हुआ।।
--सुमन्त शेखर।
दुराहा
फिर से आज दुराहा है,
जाने कौन छलावा है,
असमंजस ने उलझाया है,
किस राह हमें अब जाना है।
चिंतन का ये विषय गहन है,
प्रारब्ध स्वयं में अति प्रबल है,
किस ओर हमे यह खिंचेगा,
क्या इस रण से अब तू जीतेगा?
-- सुमन्त
बुधवार, 8 अगस्त 2018
जीना आ गया
बादलों को बरसना आ गया,
मौसम को बदलना आ गया।
बेवक्त की तेज आँधियों में,
पेड़ो को झुकना आ गया।।
ईंट पर ईंट ही रखी थी,
की आज बंगला बन गया।
और बून्द बून्द कर के देखो,
फिर से ये घड़ा भर गया।।
सागर की ऊंची तेज लहरों को,
वापस पानी मे मिलना आ गया।
इस बदलते हुए दौर में,
फिर से मुझे जीना आ गया।।
--सुमन्त शेखर।