गुरुवार, 24 जुलाई 2014

हार का विश्लेषण

खेलने क्रिकेट हम चले 
करके सब तैयारी रे 
हार गए हम पहले मैच में 
कब आएगी बारी रे 

हार का लिया पूरा संज्ञान 
हुआ विश्लेषण भारी रे 
गेंद फेंकने की जुगत में 
आंत मुह को आई रे 

बल्ले को जब हमने थामा 
गेंद विकेट पर जाये रे 
चौके छक्के मार ना पाये 
हुआ जीतना मुश्किल रे 

जिसने था अभ्यास किया 
जीत उसी ने पाई रे 
अब हमने है ठान लिया 
अबकी जीत हमारी रे |

शनिवार, 19 जुलाई 2014

गर्लफ्रेंड का तोहफा

मेरे दोस्त की बर्थडे पार्टी में 
उसकी गर्लफ्रेंड ने किया बवाल था  
केक पर दोस्त का नाम था  
साथ में दूसरी लड़की का नाम था 

लड़की के तेवर फिर गर्म हुए 
मेरे दोस्त का तेवर नरम हुआ 
लड़की को फिर जो गुस्सा आया 
फटे हाल हुआ दोस्त बेचारा 

लात घूसा चप्पल थप्पड़ की 
अब हुई यहाँ जो बारिश थी 
लगा भीगने दोस्त हमारा 
बहुत मस्त था सीन ये सारा 

बुधवार, 2 जुलाई 2014

सगाई का लड्डु

मेरे दोस्त की अभी अभी हुई है सगाई 
खुश है की अब जल्दी से मिलेगी लुगाई 
ना जाने कैसा इश्क हुआ है उनको भाई 
अब फ़ोन पर चिपके रहते है ओढ़ के रजाई 

होठ हिलते है केवल , कुछ आवाज नहीं होती  
एक दूसरे से ऐसे ही रात भर उनकी बात होती 
जान जानु सोनु बाबु बड़े प्यार से कह के बुलाते 
मीठे मीठे सपने में खोये यूं ही अक्सर रात बिताते 

मंगलवार, 24 जून 2014

धूम्रपान

बड़ा अजीब इत्तेफाक था 
ये वाकया हुआ मेरे साथ था 
मैं सड़क पर गतिमान था 
किनारे पेड़ विद्यमान था 

तभी सहसा 
हुआ एक हादसा 
पेड़ से गिरा 
एक सिगरेट जलता 

मैं हुआ स्तब्ध 
विचारो में मग्न 
क्या पेड़ भी रखते है 
धूम्रपान का शौख 

पहले तो कुछ पीड़ा हुई 
महसूस हुआ कलजुग है भाई 
इंसान तो इंसान यहाँ पर 
पेड़ भी करते है धूम्रपान 

सोमवार, 9 जून 2014

​ख्वाबो को ना रोको उड़ने से आज

​ख्वाबो को ना रोको 
उड़ने से आज 
पिंजरे का पंछी 
बन जायेगा 
जो उड़ गया आकाश में 
सारा जहां दिखा देगा 
फैलेगा तुम्हारे नाम का यश 
जहाँ तक ये ख़्वाब जा पायेगा ​
​ख्वाबो को ना रोको 
उड़ने से आज 
पिंजरे का पंछी 
बन जायेगा

सोमवार, 2 जून 2014

बारिश में बस का सफर

आज शाम की बारिश में 
बस का सफर अनोखा था 
कांच टूटी थी खिड़की की 
हर जोड़ में रिसाव था 

जैसे जैसे फिर दिन ढला 
बारिश का भी चादर फैला 
बस जैसे जैसे गतिमान हुआ 
खिड़की से पानी दाखिल हुआ 

हर मुसाफिर अब खिड़की से दूर हुआ 
जब पानी से तन सबका गिला हुआ 
खड़े हुए सब बस के भीतर 
जब जोड़ो से भी रिसाव हुआ 

बारिश ने फिर जोर लगाया 
पानी बस के भीतर आया 
बस में  दरिया का निर्माण हुआ  
हर मुसाफिर का तन गिला हुआ 

रास्ते में थे खड्डे अनेक 
बारिश में दिखते सब एक 
चालक बस को झटके देता 
पानी के छींटे ऊँचे उडाता 

जैसे तैसे सफर था काटा 
तब जाके मंजिल पर आया 
अब भी घर था दूर हमारा 
हमने भी तब छतरी डाला 

रविवार, 25 मई 2014

मेरे मित्र

कई मित्र मेरे 
जो पढ़ते थे कविता औरो की 
आज के दौर में 
रचनाकार है कविताओ के 

भटकते थे जो दर बदर 
एक नौकरी की तलाश में 
अपनी संस्था में 
लोगो को नौकरियां बाँट रहे है 

संघर्ष रत थे 
जो अध्ययन के छेत्र में 
सफल है अधयापन के छेत्र में 
वो चेहरे 

कभी जो सोचते थे 
निज लाभ का 
आज सबका भला 
सोच रहे है 

ख़्वाब जो देखे थे 
हमसब ने मिलकर 
औरो को उसके आगे का 
ख़्वाब दिखा रहे है