सोमवार, 17 नवंबर 2014

कौन था दूल्हा?

अपनी ही शादी में 
जब दुल्हा था गायब 
भेज दिया उसने 
कुरता बदले में अपने। 

चली जब दुल्हन लेने फेरे 
कुरता था लटका टँगने संग अपने
दूल्हा का भाई था कुरते को पकडे 
मानता था हर बात पंडित जो कह दे। 

पैदा हुआ भ्रम अब मेरे मन में 
कौन था दूल्हा इस दुल्हन का यहाँ पर 
कुरता था जिसका या जो था कुरते संग 
कोई तो यारो अब दुर करो मेरा भ्रम। 

बुधवार, 12 नवंबर 2014

सम्मान

कि मिलती नहीं ख़ुशी जिंदगी में युं आसानी से 
दो बोल भी काफी होते है लोगो को मुस्कुराने को
प्रयास रहेगा मेरा कि बिखेर दु हास्य आपके लिए 
आपकी एक मुस्कराहट ही सम्मान है मेरे लिए 

रविवार, 2 नवंबर 2014

धरती को तु हरा बना

ज्यों ज्यों पारा ऊपर चढ़ता 
हर जीव जगत का कष्ट है पाता 
पाने को निजाद तपन से 
हर कोई है पंखे झलता 

कोई बारिश की बाट जोहता 
कोई ठंडे पेय बनाता 
गर्मी के इस मौसम में यारो 
पानी भी है बहुत छकाता 

भूमिगत जल हो या 
हिम ध्रुव पटल पर 
सबका स्तर घटता जाता 
ज्यों ज्यों परा चढ़ता जाता 

नयी नयी तकनीको से हम 
पर्यावरण को दूषित करते 
जीवन के प्राचीन रूप को 
बड़ी सरलता से हम तजते 

है काल चक्र अब बदल रहा 
ऐ इन्सान अब संभल जरा 
हर रोज तु इक पेड़ लगा 
धरती को तु हरा बना 

शनिवार, 1 नवंबर 2014

इश्क़

इश्क़ वो नजराना है 
जिसमे लोग दुनिया से दो दो हाथ करते है 
पास में खाने को हो ना हो 
माशूक को छप्पन भोग खिलाते है 

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

दुल्हा था गायब

अपनी ही शादी में 
दुल्हा था गायब 
ऑफिस में बैठा वो 
काम कर रहा था शायद 

ऑन साइट पर भेजा उसको 
शादी में था घर आना उसको 
मैनेजर ने उसको पकड़ा ऐसा 
क्रीटिकल डिलीवरी में फंसा बेचारा 

सोच रहे है सब अब घर पर 
कब आएगी दुल्हन घर पर 
कौन सा होगा अगला मुहूरत 
जब होगा अपना दुल्हा घर पर 

शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

ख़्वाब नए नए

आँखों में पल रहे है 
अब ख़्वाब नए नए 
हर ख़्वाब को पाने के
है रास्ते नए नए। 

चल पड़ा हु मै भी अब तो 
नए रास्ते की तलाश में 
क्या पता मिलजाए मंजिल 
यही कही पास में। 

है रास्ता नया 
चुनौतियां नयी 
विविधताओं से भरा 
अनजाना रास्ता। 

हर पड़ाव में मिलेंगे 
मुसाफिर नए नए 
सब देते जायेंगे हमको 
अपने अनुभव अच्छे बुरे।

करना है अब हमको मेहनत 
पहले से कही ज्यादा 
तभी मिल पायेगा हमे 
हर ख़्वाब आँखों में पलता। 

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

दर दर भटक रहा हूँ

दर दर भटक रहा हूँ 
कुछ पाने की आस में 
प्यास लगी है जोरो की 
कुआँ है पास में 
बंधी है बाल्टी 
रस्सी के छोरो में 
घुमती है चकरी 
बाल्टी के डोरो में 
कोशिस की हमने भी 
अपनी तकनीको से 
की आ जाये पानी 
डोरे की बाल्टी से 
छलकती है बाल्टी 
पानी को छुने में 
भरती है पानी 
बाल्टी के पेंदे में 
खींचता हु डोरा 
अपने बाजु के जोरो से 
बाहर आता है पानी 
बाल्टी के भरने से |